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चार सौ मौतें भी खबर नहीं ! October 24, 2007

Filed under: Discussion — cmsmedialab @ 11:15 am

 रियलिटि शो में प्रतियोगियों की कशमकश या ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट का खुमार अब तक शायद आपके ज़ेहन से उतरा नहीं होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं आपके ही देश के एक हिस्से में सिर्फ इसी वर्ष लगभग चार सौ लोग एक ही बीमारी के कारण मौत के मुंह में समा चुके हैं. आपकी जानकारी से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि क्रिकेट के मैदान और रियलिटी शो के स्टूडियो से पल पल कि जानकारी लाने वाली मीडिया साल भर से जारी इस घटना को क्यों नहीं दिखा पायी.

यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि देश में हुई इतनी बडी घटना यहां के संचार माध्यमों के नज़र में नहीं आती है जबकि एक विदेशी समाचार संस्थान इसे प्रमुखता से प्रसारित करता है.

इस हालत ने एक और सवाल खडा कर दिया है कि क्या लगातार गलाकाट प्रतियोगिता बढने के बावजूद भारतीय मीडिया की गुणवत्ता स्तरीय नही हो पायी है. आज भारत में लगभग 50 समाचार चैनल खबरों का प्रसारण कर रहे हैं , बडी संख्या में चैनल लाइन में भी हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इनकी बढती संख्या से समाचारों का दायरा बढा है ? जबाव नकारात्मक ही प्रतीत होता है.

आज सभी माध्यमों की पुरजोर कोशिश अधिक से अधिक दर्शक या श्रोता तक पहुंचने की है. लेकिन क्या उस दर्शक या श्रोता वर्ग की जरूरतों को ये चैनल ध्यान में रख रहे हैं ? किसी खास वर्ग का टेस्ट इन जरूरतों पर हावी तो नहीं हो रहा ? आम आदमी की जरूरतों के प्रति मीडिया का रवैया आजकल सवालों के घेरे में है ..

देश के सबसे बडे राज्य में एक ही बीमारी से मरने वालों का आंकडा चार सौ पार कर जाता है मगर राष्ट्रीय चैनलों पर इसकी भनक तक नहीं सुनाई देती है. इसी स्थिति से नागरिक मुद्दों के प्रति समाचार चैनलों की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

मामला पूर्वी उत्तर प्रदेश का है. इसके दस जिलों में दिमागी बुखार नामक बीमारी ने भयानक रूप धारण किया हुआ है. इस बीमारी से सिर्फ इस साल लगभग चार सौ जानें जा चुकी हैं. बिडंबना है कि किसी भी राष्ट्रीय चैनल ने इस खबर को कवर करने की कोशिश नहीं की. यहां तक कि जनता के पैसे से चलने वाले चैनल दूरदर्शन पर भी यह खबर नहीं दिखायी गयी. गौरतलब है कि वर्ष 2005 में भी इसी बीमारी से लगभग 1600 लोगों की जान चली गयी थी.

यह खबर 22 अक्टूबर को बीबीसी रेडियो की हिन्दी सेवा ने प्रसारित की. इसने एक घंटे के कार्यक्रम आजकल में लगभग 3 मिनट का न्यूजटाइम इस खबर पर खर्च किया. ध्यान देने की बात है जिस समय यह खबर प्रसारित हुई उसी समय प्रभावित क्षेत्र भारतीय समाचार चैनलों पर चर्चा का विषय जरूर था मगर किसी अन्य कारण से. योगी आदित्यनाथ के जूलुस में फायरिंग इस समय टीवी न्यूज चैनलों की हॉट स्टोरी थी. यह खबर भी गोरखपुर की थी. बीमारी से प्रभावित 10 जिले इसी के आस पास हैं.

भौगोलिक सीमा से बाहर निकल कर देखें तो जिस खबर को इस दिन टीवी चैनलों पर सबसे ज्यादा महत्व मिला वह थी संजय दत्त का दुबारा जेल जाना. दूसरे शब्दों में कहें तो एक सितारे से जुडी खबर लोकहित पर भारी रही.

बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बिहार और नेपाल के लोग भी इस बीमारी की चपेट में आकर मर चुके हैं. इस प्रकार यह मामला सिर्फ राज्य या क्षेत्र विशेष की सीमा में न सिमट कर अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का हकदार है. इस हालत में राष्ट्रीय मीडिया में इस खबर को जगह न मिलना चिंताजनक है.

खबर में यह भी बताया गया कि प्रशासन ने बीमारी फैलानेवाले वायरस जापानी इनसेफ़लाइटिस पर काबू पाने का दावा किया है लेकिन अब किसी नये वायरस की वजह से बीमारी फैल रही है जिसका पता नहीं चल पा रहा है. ऐसे में प्रशासनिक विफलता का भी मामला बनता है.   बीमारी बाढ के प्रदूषित पानी के कारण फैली. इस प्रकार बुनियादी नागरिक सुविधाओं का भी प्रश्न उठता है.

प्रभावितों की बडी संख्या , बडा भौगोलिक क्षेत्र, नागरिक जीवन के विभिन्न दृष्टिकोण आदि सब कुछ होने के बावजूद इस खबर को मीडिया ने नजरअंदाज किया है. ऐसा भी नहीं है कि मीडिया की ओर से इन मुद्दों की उपेक्षा का यह पहला मामला हो. खास कर स्वास्थ्य विषय पर तो मीडिया का ध्यान बिल्कुल ही नहीं है. हाल ही में एक रिपोर्ट में सीएमएस मीडियालैब ने कहा था कि भारत के प्रमुख टीवी न्यूज चैनल समाचारों के लिए खर्च कुल समय का महज 0.7% स्वास्थ्य संबंधी खबरों पर खर्च करते हैं. देश के कई पिछडे इलाकों खासकर आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव लगातार मौतों का कारण बन रहा है लेकिन ये खबरें सब तक नहीं पहुंच पाती हैं.

जाहिर तौर पर इस भयानक बीमारी से मौतों का सिलसिला अभी रुका नहीं है लेकिन यह घटना एक बार फिर सवाल छोड गयी है कि क्या मीडिया कम महत्व की या कम लोगों को प्रभावित करनेवाली खबरों को जनहित के मुद्दों से ज्यादा तरजीह देता रहेगा ? चैनलों के व्यावसायिक हितों के कारण ऐसा होने की संभावना ज्यादा दिखती है. ऐसे में फिर एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि जनसामान्य की जरूरतों की तस्वीर कौन दिखायेगा और इन खबरों के लिए किससे उम्मीद करेंगे.

 

बाथरूम में बेहोश खबर ….. September 28, 2007

Filed under: Uncategorized — cmsmedialab @ 9:54 am

एक स्कूल…

जहां बाथरूम जाते ही…

लडकियां हो जाती है

                                     बेहोश…

क्या है बाथरूम का राज?

क्राइम रिपोर्टर.

देखते रहिए…

ये किसी सी ग्रेड फिल्म की पंक्तियां नहीं ,बल्कि एक लोकप्रिय चैनल के साप्ताहिक कार्यक्रम का प्रोमो है. आजकल टीवी न्यूज चैनलों पर अपराध समाचार के नाम पर इस तरह के संवादों को पेश करने का दौर चल पडा है. एक अन्य चैनल पर अपराध समाचारों पर आधारित कार्यक्रम के प्रोमो में लगातार एक हसीना‘ ‘ दो दीवानेजैसे जुमलों का प्रयोग किया जाता रहा.

इन दो प्रोमो से स्पष्ट है कि टीवी चैनल समाचार दिखाने की बजाय उन्हें भुनाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं. इसके लिए खबर को ज्यादा से ज्यादा सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है. अपराध आधारित कई कार्यक्रमों के नाम भी उतने ही सनसनीखेज रखे गये हैं. कई बार तो एंकर इतने जोश में  बोल रहे होते हैं मानो बहुत बडी सफलता मिली हो.
      सवाल उठता है कि क्या इन कार्यक्रमों में प्रस्तुत संवाद में न्यूजसेंस भी है? अगर हां, तो क्या उस न्यूजसेंस के साथ न्याय किया जा रहा है?

क्यों दिखायी जाती है ऐसी खबरें:

मीडिया पर हावी बाजार के दबाव व अन्य तथ्यों पर गौर करें तो पता चलता है कि अपराध समाचारों पर आधारित इन कार्यक्रमों में आम तौर पर मानवीय रूचि का सबसे ज्यादा ध्यान रखा जाता है. इस कारण खबरों को नाटकीय व सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है.

सोचने की बात है कि क्या बाजार की होड व टीआरपी की दौड में संवादों को इतने घटिया स्तर तक जाने देना चाहिए ? साथ ही यह भी कि इन खबरों का कितना प्रभाव किन पर पडता है?

ध्यान से देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की ये खबरें दूरगामी प्रभाव वाली नहीं होती है न ही बहुत बडे जनसमुदाय को प्रभावित करती है. एक छोटी सी आबादी तक ही इनका प्रभाव सीमित होता है.

कैसी हो प्रस्तुति:

सबसे पहले तो प्रस्तुत की जानेवाली सूचनाओं के न्यूजसेंस का ध्यान रखा जाना चाहिए. उचित न्यूजसेंस होने पर ही उनको खबर के रूप में दिखाना चाहिए. प्रस्तुति में आवश्यक तथ्यों को ही महत्व दिया जाना चाहिए. अनावश्यक नाटकीयता और सनसनी से बचना चाहिए.

क्या होगा असर :

कम महत्व के खबरों को इस तरह प्रस्तुत करने से महत्वपूर्ण मुद्दों पर जरूरी चर्चा नहीं हो पायेगी. उनके लिए जरूरत से कम समय और संसाधन उपलब्ध हो पाएंगे. एक सर्वेक्षण के अनुसार टेलीविजन भारत की लगभ्ग आधी आबादी के लिए सूचना का प्राथमिक स्रोत है. कम महत्व की खबरों को अनावश्यक रूप से चटपटा बनाकर पेश करने से टीवी महज मनोरंजन के साधन के रूप में सीमित रह जाएगा. साथ ही , गंभीर मुद्दों पर चर्चा बाधित होने से देश की सामाजिक आर्थिक प्रगति भी कहीं न कहीं प्रभावित होगी.

 

पहले पन्ने के लिए अखबारों की प्राथमिकता September 27, 2007

Filed under: Analysis — cmsmedialab @ 5:59 am

 

  • भूमिका

  • प्रक्रिया

  • खबरों का विषय

  • कहाँ से आयी है खबरें

  • प्रभाव क्षेत्र (राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय)

  • प्रस्तुति

  • स्रोत

  • चित्रों का प्रयोग

  • प्राथमिकताओं में तुलना

  • पहले पन्ने के लिए अखबारों की प्राथमिकता: प्रमुख निष्कर्ष

 

 

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भूमिका

 

अखबार लंबे समय से प्रामाणिक सूचना का स्रोत रहे हैं. आज संचार के नए नए माध्यमों के आ जाने के बाद भी हालत यह है कि बहुत से लोग टीवी पर खबर देखने के बाद अगले दिन के अखबार से उसे कन्फर्मकरते हैं.

 

पहले पन्ने को अखबार का आईना माना जाता है. इस पर छपी खबरों का आम जनता पर व्यापक प्रभाव पडता है. इन विषयो के प्रति लोगों में जागरुकता भी बढती है. कई बार पहले पन्ने की खबरें उस दिन की अन्य घटनाओं की महत्ता को मापने का पैमाना भी बनती है. एक वरिष्ठ पत्रकार के शब्दों में अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबरें उस दिन का इतिहास तय करती हैं.”

 

इसलिए अखबारों की जिम्मेदारी बनाती है की वह पहले पन्ने पर ऐसी खबरों को छापें जिनका आमजन से व्यापक सरोकार हो, जिनके बारे में जानना देश व समाज के विकास के लिए जरुरी हो और जो लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले हों.

 

अखबार किन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं, यह पहले पन्ने पर छपी खबरों से स्पष्ट हो जाता है. इसलिए पहले पन्ने पर छपी खबरों के प्रति उनकी प्राथमिकता के बारे में जानना महत्वपूर्ण है. इस समय देश में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के अखबार बड़ी संख्या में पढे जाते हैं. दोनों ही भाषाओं के अखबारों का अपना ख़ास पाठक वर्ग है. इसलिए दोनों की प्राथमिकताओं का अलगअलग विश्लेषण भी जरुरी है.

 

दोनों भाषाओ के अखबारों की प्राथमिकताओं को जानने के लिए सीएमएस मीडिया लैब द्वारा अगस्त 2007 में प्रकाशित प्रमुख हिन्दी और अंग्रेजी दैनिकों के पहले पन्ने का अध्ययन किया गया.

 

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प्रक्रिया

 

1-31 अगस्त के बीच प्रकाशित हिन्दी दैनिकों हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा व अंग्रेजी दैनिकों द हिन्दू, द इंडियन एक्स्प्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने पर का अध्ययन किया गया.

इनमें छपी खबरों का निम्नलिखित आधारों पर विश्लेषण किया गया.

 

  • खबरों का विषय

  • कहां से आयी हैं

  • प्रभाव क्षेत्र (अंतर्राष्ट्रीय/राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय),

  • प्रारूप,

  • स्रोत,

  • चित्रों का प्रयोग और

  • हिन्दी व अंग्रेजी अखबारों की प्राथमिकताओं में तुलना.

 

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खबरों का विषय

 

दोनों ही भाषाओं के अखबारों में राजनीति की खबरों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी गयी है. इसके बाद अपराध को प्राथमिकता दी गयी है. वहीं कलासंस्कृति, पर्यावरण, वन्य जीवन, फैशन, जीवनशैली, मौसम, कृषि और मीडिया जैसे महत्वपूर्ण विषयों को दोनों ही भाषाओं के अखबारों ने नजरअंदाज किया. अखबारों के पहले पन्ने पर इन विषयों से न के बराबर खबरें छपी.

 

राजनीति व अपराध पर की खबरों की संख्या आर्थिक मामलों के खबरों के दोगुना से ज्यादा है. वहीं विकास संबंधी अन्य विषयों से कई गुना ज्यादा संख्या में राजनीति व अपराध की खबरें छपी.

 

अलग अलग विषयों की खबरों को मिली प्राथमिकता का विश्लेषण आगे किया जा रहा है.

 

राजनीति :

 

दोनों भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर राजनीति की खबरें सबसे ज्यादा छपी. हालांकि अंग्रेजी अखबारों ने इस विषय को ज्यादा (हिन्दी के मुकाबले 3% ज्यादा) कवरेज दी. उनमें पहले पन्ने पर छपी 23% खबरें इस विषय से थीं. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इस विषय की 20% खबरें छपीं.

 

अपराध :

 

दोनों ही भाषा के पत्रों की दूसरी प्राथमिकता अपराध विषय है. दोनों ने अपराध की खबरों को बराबर प्राथमिकता दी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने की 13% खबरें इस विषय पर हैं. वहीं अंग्रेजी अखबारों मे इस विषय के अखबारों की संख्या 12% है.

 

अंतर्राष्ट्रीय :

 

अंतर्राष्ट्रीय मामलों की खबरों को भी अखबारों पहले पन्ने पर प्रमुखता दी. इस विषय पर हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा खबरें छपी. हिन्दी अखबारों मे पहले पन्ने पर 12% खबरें इस विषय से हैं. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 9% खबरें इस विषय से हैं.

 

न्यायव्यवस्था :

 

दोनों भाषाओं के पत्रों ने न्यायव्यवस्था को बराबर प्राथमिकता दी. दोनों भाषाओं के अखबारों मे पहले पन्ने पर इस विषय के खबरों की संख्या 9-9% है.

 

आर्थिक मामले :

 

हिन्दी अखबारों में व्यापार/ आर्थिक मामलों की खबरें अंग्रेजी से ज्यादा छपी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर औसतन 7% खबरें आर्थिक मामलों से थी वहीं अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर 5% खबरें इस विषय से थीं.

 

मानवीय रुचि:

 

मानवीय रुचि की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बराबर प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर इस विषय से 6% खबरें थी.

 

खेल :

 

खेल की खबरों को दोनों अखबारों पहले पन्ने पर लगभग बराबर प्रमुखता दी. हालांकि हिन्दी अखबारों में इनकी संख्या अंग्रेजी के मुकाबले थोडी ज्यादा है. हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर खेल की खबरों की संख्या कुल खबरों का 7% थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल समाचारों का 6% खेल समाचार थे.

 

सुरक्षा :

 

राष्ट्रीय सुरक्षा की खबरों को हिन्दी से ज्यादा प्राथमिकता अंग्रेजी अखबारों ने दी. इनके पहले पन्ने पर 5% खबरें राष्ट्रीय सुरक्षा विषय से थी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इन खबरों की संख्या कुल खबरों का 3% थी.

 

फ़िल्म :

 

फिल्म, मनोरंजन व सेलिब्रेटी से जुडी खबरों को हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों ने बराबर प्राथमिकता दी. दोनों भाषाओं के अखबारों के पहले पन्ने पर इन विषयों से 4-4% खबरें छपी.

 

जननिति/शासन :

जननीतियों और शासन की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बराबर प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 4-4% इस विषय थीं.

 

दुर्घटना/प्राकृतिक आपदा :

 

दुर्घटनाओं व प्राकृतिक आपदाओं की खबरों को भी दोनों भाषा के पत्रों ने समान प्रमुखता दी. दोनों ही भाषाओं के पत्रों के पहले पन्नों पर इस विषय की लगभग 3% खबरें छपी.

 

कानूनव्यवस्था :

 

हिन्दी अखबारों ने पहले पन्ने पर कानून व्यवस्था की खबरों को ज्यादा संख्या में (अंग्रेजी के मुकाबले) प्रकाशित किया. हिन्दी पत्रों के पहले पन्ने पर कुल खबरों की 3% संख्या इस विषय से थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों में इस पन्ने पर 2% खबरें इस विषय से थी.

 

भ्रष्टाचार:

 

भ्रष्टाचार की खबरों की कवरेज में दोनों भाषाओं के अखबारों में बडा अंतर है. हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के दोगुने से ज्यादा संख्या में भ्रष्टाचार की खबरों को पहले पन्ने पर छापा. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इस विषय के खबरों की संख्या कुल खबरों का लगभग 5% थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर मात्र 2% खबरें इस विषय से थीं.

 

शिक्षा :

शिक्षा की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बराबर महत्व दिया. दोनों के पहले पन्ने पर छपी 2% खबरें शिक्षा से थीं.

 

नागरिक मामले:

 

नागरिक मामलों से जुडी खबरों को हिन्दी अखबारों ने अपेक्षाकृत ज्यादा प्राथमिकता दी. इनके पहले पन्ने पर 4% खबरें नागरिक मामलों की थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर इस विषय की 3% खबरें छपी.

 

स्वास्थ्य :

 

स्वास्थ्य की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बहुत कम प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 1% इस विषय से थीं.

 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी :

 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी की खबरों को हिन्दी अखबारों ने पहले पन्ने पर अंग्रेजी के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दी. हालांकि इनकी संख्या हिन्दी अखबारों में छपी अन्य खबरों की तुलना में बहुत कम है. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल खबरों की महज 1% संख्या इस विषय से थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों में इस पन्ने पर विज्ञान व प्रौद्योगिकी से न के बराबर खबरें छपीं.

 

अन्य विषय :

 

दोनों भाषाओं के अखबारों ने अन्य विषयों की खबरों को बराबर प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर 2-2% खबरें अन्य विषयों की थी.

 

*** धार्मिक विषय की खबरें सिर्फ हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर छपी. इनकी संख्या इस पन्ने पर छपी कुल खबरों की संख्या का 1% थी. वहीं मौसम की खबर सिर्फ अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर छपी. इनकी भी संख्या अंग्रेजी पत्रों के पहले पन्ने पर छपी खबरों का 1% थी.

 

राजनीति व भ्रष्टाचार को छोडकर शेष विषयों के प्रति दोनों अखबारों की प्राथमिकताओं में खास अंतर नहीं है. राजनीति की खबरों को अंग्रेजी अखबारों में प्राथमिकता मिली वहीं भ्रष्टाचार की खबरों को हिन्दी अखबारों में ज्यादा प्राथमिकता दी गयी.

 

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कहाँ से आयी है खबरें

 

दोनों ही भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर अधिकतर दिल्ली से आयी खबरें थी. ग्रामीण क्षेत्रों, चेन्नै और कोलकाता से आयी खबरों को न के बराबर जगह दी गयी हैं. इस पन्ने पर दिल्ली आयी खबरों की संख्या लगभग 61.5% है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों, चेन्नै और कोलकाता तीनों वर्गों की खबरों की कुल संख्या लगभग 1% है.

 

अलग अलग जगहों से आयी खबरों को मिली प्राथमिकता का विश्लेषण आगे किया जा रहा है.

 

दिल्ली :

 

दिल्ली से आयी खबरें लगभग सभी अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी. यहां से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा तरजीह दी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर 66 फीसदी खबरें दिल्ली से आयी जबकि अंग्रेजी अखबारों मे इस पन्ने पर दिल्ली से आयी खबरें (57%) थी.

 

अंतर्राष्ट्रीय :

 

दूसरे देशों से आयी खबरों को अखबारों दोनों भाषाओं के अखबारों ने लगभग बराबर प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया. अंग्रेजी अखबारों मे पहले पन्ने पर विदेश से आयी खबरों की संख्या 11% थी. वहीं हिन्दी अखबारों में इन खबरों की संख्या 10% थी.

 

अन्य शहर (राजधानियों को छोडकर) :

 

अन्य शहरों से आयी खबरें भी लगभग सभी अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी. इन शहरों से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों ने अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया. इनके पहले पन्ने पर अन्य शहरों से आयी 12% खबरें छपी जबकि अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर इन शहरों से आयी 10% खबरें छपी.

 

राजधानी (महानगरों को छोडकर):

 

राज्यों की राजधानियों को अंग्रेजी अखबार ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. अंग्रेजी अखबारों ने पहले पन्ने पर राज्यों की राजधानियों से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों के दुगुने से भी ज्यादा संख्या में प्रकाशित किया. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर राजधानियो से आयी 12% खबरें थी वहीं हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर इनकी संख्या महज 5% रही.

 

ग्रामीण क्षेत्र :

 

ग्रामीण इलाकों के प्रति दोनों भाषाओं के अखबार उदासीन हैं. लगभग सभी अखबारों के पहले पन्ने पर ग्रामीण क्षेत्रों से आयी खबरों की संख्या नगण्य है.

 

चेन्नै /कोलकाता :

 

महानगर होने के बावजूद चेन्नै और कोलकाता से आयी खबरों को अखबारों के पहले पन्ने पर न के बराबर जगह मिली है. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इन दोनों जगहों से आयी खबरें न के बराबर छपी. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कोलकाता से आयी 1% खबरें छपी.

 

मुम्बई :

 

अंग्रेजी अखबारों ने मुंबई से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दी. इनके पहले पन्ने पर मुंबई से आयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 10% थी. वहीं हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर मुंबई से आयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 8% थी.

 

इस तरह स्प्ष्ट हो जाता है कि सभी अखबारों की पहली प्राथमिकता दिल्ली है और सुदूर के इलाकों में इनकी दिलचस्पी कम है.

 

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प्रभाव क्षेत्र (राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय)

 

राष्ट्रीय :

 

राष्ट्रीय प्रभाव की खबरों को अखबारों ने पहले पन्ने की लिए सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी है. पहले पन्ने पर छपी दस में से चार खबरें राष्ट्रीय प्रभाव की रहती हैं. दोनों भाषाओं के अखबारों को अलग अलग देखें तो राष्ट्रीय प्रभाव वाली खबरों को दी गयी प्राथमिकता में ज्यादा अंतर नहीं है.

 

हिन्दी अखबारों के प्रथम पृष्ठ के 41% समाचार इस विषय से हैं, वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर भी इस विषय की खबरों की संख्या 38% है.

 

प्रादेशिक :

 

इसके बाद प्रादेशिक स्तर पर प्रभाव रखने वाले खबरों को अंग्रेजी अखबारों ने हिन्दी के मुकाबले ज्यादा प्रमुखता दी. इनके पहले पन्ने पर 36% खबरें प्रादेशिक प्रभाव वाली थी. वहीं हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर इन खबरों की संख्या 30% थी.

 

अंतर्राष्ट्रीय :

 

दोनों भाषा के अखबारों में अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वाले समाचारों को पहले पन्ने पर स्थान दिया गया है. हालांकि इनकी संख्या राष्ट्रीय और प्रादेशिक प्रभाव वाली खबरों की तुलना में बहुत कम है.

 

अंग्रेजी अखबारों ने अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वाले समाचारों को हिन्दी अखबारों के मुकाबले ज्यादा प्राथमिकता दी. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर इनकी संख्या कुल खबरों का 18% थी जबकि हिन्दी अखबारों मे कुल खबरों का 15% अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वाली खबरें थी.

 

स्थानीय :

 

पहले पन्ने पर स्थानीय महत्त्व के समाचारों को सबसे कम प्रमुखता मिली है. हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के मुकाबले लगभग दुगुनी संख्या में स्थानीय महत्व के समाचारों को पहले पन्ने पर जगह दी.

 

हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर स्थानीय महत्व की 15% खबरें छपी. वहीं अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर 8% खबरें स्थानीय प्रभाव की थी.

 

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प्रस्तुति

 

प्रस्तुति को लेकर दोनों भाषाओं के पत्रों में खास अंतर नहीं है. दोनों भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर सामान्य समाचारों की प्रधानता है. विश्लेषण कम संख्या मे हैं, फीचर और अन्य रूप इससे भी कम हैं.

 

दोनों ही भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर छपी दस में नौ खबरें सामान्य समाचार के रूप में होती है. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने सामान्य समाचारों की संख्या पर 93% है. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 91% सामान्य समाचार के रूप में छपे.

 

अंग्रेजी अखबारों में विश्लेषणों की संख्या हिन्दी के मुकाबले 1.5 गुना है. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 6% विश्लेषण के रूप में छपे. जबकि हिन्दी अखबारों में इनकी संख्या 4% है.

 

फीचरों और अन्य प्रस्तुतियों की संख्या दोनों भाषाओं के अखबारों में बराबर है. दोनो भाषाओं के पत्रों में फीचरों की संख्या 1-1% और अन्य प्रस्तुतियों की संख्या 2-2% है.

 

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स्रोत

खबरों के लिए प्रयोग किये जा रहे स्रोत यह स्पष्ट करते हैं कि उन खबरों के प्रति अखबार कितने गंभीर हैं. स्रोत के विश्लेषण से हम पाते हैं महत्वपूर्ण मुद्दों को कवर करने के लिए अखबार अपने संवाददाताओं को रखते हैं. अधिकतर अखबारों ने पहले पन्ने पर अपने पत्रकारों की खबरों को प्राथमिकता दी.

 

इस पन्ने की खबरों के लिए कम ही अखबार समाचार समितियों पर निर्भर हैं. जहां अखबारों के संवाददाता नहीं हैं वहां की खबरें संवाद समितियों से ली गयी. कई बार संवाददाताओं और समाचार समितियों का प्रयोग संयुक्त रूप से किया गया.

 

अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर उनके संवाददातओं द्वारा भेजी गयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 76% थी वहीं हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने के 70% ऐसी खबरें थी.

 

समाचार समितियों को हिन्दी अखबारों ने ज्यादा प्राथमिकता दी. हिन्दी अखबारों ने पहले पन्ने पर अंग्रेजी के मुकाबले चार गुना संख्या में समाचार समितियों की खबरों को प्रकाशित किया. हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर समितियों की खबरों की संख्या कुल खबरों का 24% है. अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर मात्र 6% खबरें समाचार समितियों की हैं.

 

अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 14% खबरें ऐसी थी जिनके लिए संवाददाता और समितियों दोनों स्रोतों का प्रयोग किया गया. हिन्दी के तीन अखबारों ने सिर्फ एक एक बार ऐसा किया है.

 

कुछ मामलों में अखबारों ने खबरों के स्रोत का उल्लेख नहीं किया. दोनों भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर 4% खबरें ऐसी हैं जिनके स्रोत का जिक्र नहीं किया गया.

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चित्रों का प्रयोग

 

कहा गया है कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है“. अखबारों इस कथन की पुष्ट किया है. दोनों भाषाओ के अखबारों में पहले पन्ने के लगभग आधे समाचारों के साथ चित्रों का प्रयोग किया गया है. कई बार तो सिर्फ़ चित्र ही छापे गए हैं.

 

चित्रों के मामले में दोनों भाषाओं के अखबारों की प्राथमिकताएं भिन्न हैं. हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के मुकाबले 15% ज्यादा खबरों के साथ चित्र छापा. हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर 62% खबरों के साथ चित्र छपे जबकि अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 47% के खबरों साथ चित्र प्रकाशित किये गये.

 

हिन्दी अखबारों में ऐसी खबरों की संख्या कम (अंग्रेजी से 11% कम) है जिनके साथ चित्र नहीं छपे. अंग्रेजी में अखबारों के पहले पन्ने पर 43% ख़बरें बिना चित्र के छपी. वहीं हिन्दी अखबारों मे पहले पन्ने पर 32% खबरों के साथ कोई चित्र प्रकाशित नहीं हुआ.

 

खबर के रूप में सिर्फ चित्र को अंग्रेजी अखबारों ने अधिक प्रमुखता दी है. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 10% समाचार ऐसे थे जिनमें सिर्फ चित्र था. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर ऐसे समाचारों की संख्या 6% थी.

 

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प्राथमिकताओं में तुलना

 

हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ के अखबारों की प्राथामिकताओ में कोई बड़ा अन्तर नही है. खबरों के स्थान, प्रस्तुति और चित्र आदि के मामलो में तो स्थिति लगभग एक जैसी है. विषयो और स्रोत के संदर्भ में दोनों भाषाओ के अखबारों में अन्तर है.

 

हिन्दी अखबार खबरों के लिए समाचार समितियों पर अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले ज्यादा निर्भर हैं. लगभग सभी पत्रों के पहले पन्ने पर ज्यादातर (लगभग दो तिहाई) खबरें    उनके पत्रकारों की है.

 

विभिन्न विषयो की खबरों की संख्या तो लगभग बराबर है. अंतर्राष्ट्रीय मामले, राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा जैसे विषयों की संख्या अंग्रेजी अखबारों में ज्यादा है. शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार, अर्थव्यवस्था व नागरिक मामलो जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे सभी अखबारों में हाशिए पर हैं. राजनीति व अपराध की खबरें ही पहले पन्ने पर छायी हुई हैं.

 

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पहले पन्ने के लिए अखबारों की प्राथमिकता: प्रमुख निष्कर्ष

 

चार प्रमुख हिन्दी दैनिकों हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा व नवभारत टाइम्स और चार प्रमुख अंग्रेजी दैनिकों हिन्दुस्तान टाइम्स, द टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू और द इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने के समाचारों के अध्ययन से निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त हुए.

 

  • राजनीति की खबरें अखबारों की पहली प्राथमिकता है. इस पन्ने पर औसतन 16.5% खबरें राजनीति से रहती हैं. अंग्रेजी अखबार राजनीति की खबरों को ज्यादा (हिन्दी के मुकाबले 3% ज्यादा) प्राथमिकता देते हैं.

  • दोनों भाषाओं के अखबारों में राजनीति के बाद अपराध की खबरों को प्रमुखता दी जाती है. पहले पन्ने पर औसतन 12.5% समाचार इस विषय से हैं.

  • शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, कृषिव्यापर व बुनियादी सुविधाएं जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को पहले पन्ने पर बहुत कम जगह दी जा रही है. पहले पन्ने पर छपी इन विषयों की खबरों को मिला दें तो वह कुल खबरों की संख्या का दस फीसदी हैं.

  • राष्ट्रीय महत्व की खबरें पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपती हैं. इस पन्ने पर 10 में से 4 खबरें राष्ट्रीय महत्व की रहती हैं. दोनों भाषाओं के अखबारों ने इन खबरों को लगभग बराबर प्राथमिकता दी.

  • पहले पन्ने पर दिल्ली से आयी खबरें सबसे ज्यादा संख्या में रहती हैं. दस में छः खबरें दिल्ली से होती हैं. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर 41% खबरें राष्ट्रीय प्रभाव वाली थी जबकि अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर ऐसी खबरों की संख्या 38% है.

  • ग्रामीण इलाकों की खबरों को पहले पन्ने पर नही के बराबर जगह दी जाती है. हिन्दी के तीन और और अंग्रेजी के एक अखबार ने पहले पन्ने पर सिर्फ एक एक खबर को जगह दी.

  • विश्लेषण और फीचर के रूप में बहुत कम खबरें छपती हैं. दोनों रूपों को मिलाकर औसतन 6% खबरें रहती हैं.

  • पहले पन्ने पर संस्थान के पत्रकारों द्वारा भेजी गयी खबरों की संख्या ज्यादा रहती है. इसके बाद समाचार समितियों से आयी खबरों की संख्या रहती है.

  • अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर उनके संवाददातओं द्वारा भेजी गयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 76% थी वहीं हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने के 70% ऐसी खबरें थी.

  • अंग्रेजी अखबार स्रोत के रूप में कई बार समाचार समितियों और अपने पत्रकारों दोनों का प्रयोग संयुक्त रूप से करते हैं. हिन्दी के तीन अखबारों ने सिर्फ एक एक बार ऐसा किया है. जबकि अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 14% खबरें ऐसी थी.

  • पहले पन्ने पर चित्रों का प्रयोग प्रमुखता से होता है. कई बार समाचार के रूप में केवल चित्र भी प्रकाशित किए जाते हैं. औसतन 8% चित्र ऐसे हैं जिनके साथ टेक्स्ट नहीं छापा गया है.

  • कुछ मामलों को छोड कर हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों की प्राथमिकताएं एक जैसी हैं. मुख्य अंतर खबरों के स्रोत में है. अंतर्राष्ट्रीय मामले, राजनीति और सुरक्षा विषयों की खबरों की संख्या में दोनों भाषाई अखबारों में थोडाबहुत अंतर है.

 

* स्रोत : सीएमएस मीडिया लैब

 

अध्ययन अवधि : अगस्त 2007 .

 

 

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# जिन अखबारों का अध्ययन किया गया :

 

* अंग्रेजी अखबार

  • हिन्दुस्तान टाइम्स

  • द टाइम्स ऑफ इंडिया

  • द हिन्दू

  • द इंडियन एक्सप्रेस

 

* हिन्दी अखबार

  • राष्ट्रीय सहारा

  • हिन्दुस्तान

  • दैनिक जागरण

  • नवभारत टाइम्स

 

 

 

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बदलते वक्त का ब्रेकिंग न्यूज August 31, 2007

Filed under: Uncategorized — cmsmedialab @ 7:00 am

बदलाव समय की नियती है. समय के साथ साथ हर चीज बदलती है, इस लिहाज से मीडिया में बदलाव भी लाजिमी है. मगर स्थिति हास्यास्पद तब हो जाती है जब यह बदलाव दिशाहीन हो जाए. हाल के दिनों में यह दिशाह्वीन बद्लाव दिख रहा है टेलीविजन की दुनिया में सबसे ज्यादा प्रचलित शब्द ब्रेकिंग न्यूज के अर्थ में. जो तथ्य समाचार बनने के भी लायक नहीं उन्हें जिस तरह से ब्रेकिंग न्यूज कह कर प्रस्तुत किया जा रहा है उससे लगता है कि “समाचार” या “न्यूज” शब्द की परिभाषा ही बदल चुकी है.

 

पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे ट्रेंड को देखें तो लगता है कि “ब्रेकिंग न्यूज” का अस्तित्व ही खत्म हो गया है. ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर जो चीजें टेलीविजन चैनलों की ओर से परोसी जा रही हैं उनमें से अधिकांश फिल्मी सितारों , खिलाडियों या नेताओं की जिंदगी से सम्बद्ध होते हैं. उनसे सम्बद्ध कोई महत्वपूर्ण तथ्य नहीं बल्कि उनके दैनिक जीवन के क्रियाकलाप. या फिर किसी कि निजी जिन्दगी में बनते बिगडते रिश्ते ब्रेकिंग न्यूज की जगह लेते हैं. किन्ही दो लोगों का अफेयर , उनके बारे में उडी अफवाह आदि चीजें ही आज ब्रेकिंग न्यूज कह कर दिखलायी जा रही हैं.

 

स्थिति को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए हम बीते दिनों प्राईम टाईम में प्रसारित कुछ ब्रेकिंग न्यूज पर नजर डालते हैं.

 

२३.०८.०७ रात १०:३० बजे – स्टार न्यूज : ऐश्वर्या मां बनने वाली नहीं, अभीषेक का इनकार

२७.०८.०७ रात १०:१५ बजे – आज तक : जोधपुर जेल सुपरिंटेंडेंट का बयान, सलमान ने जेल में खाया खाना.

 

ब्रेकिंग न्यूज की शुरुआत के बारे में विश्लेषक कहते हैं कि यह कल्पना खबरिया चैनलों के आरंभिक दिनों में उभरी. उन दिनों यह व्यवस्था बनायी गयी कि अगर अचानक कोई बहुत बडी घटना हो जाती है या राष्ट्रीय-सामाजिक परिदृश्य में कुछ ऐसा होता है जिसका समाज देश या दुनिया पर व्यापक असर पडने वाला है तो पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों को ब्रेक कर (रोक कर) इन नयी जानकारियों का प्रसारण किया जाता था. आज हालात यह है कि नाग-नागिन के प्रेमालाप से लेकर बंदर भालू के करतब या जेल में बंद एक सेलीब्रेटी कैदी का खाना-सोना ब्रेकिंग न्यूज कहा जा रहा है.

 

सवाल उठता है कि ब्रेकिंग न्यूज क्या हो? किन खबरों को ब्रेक किया जाए? विशेषज्ञों के अनुसार मीडिया का पहला काम जनमानस तक उपयोगी जानकारी पहुंचाना है. जानकारियों में प्रभावोत्पादकता भी हो और व्यापक जनहित भी जुडा हो. पर आजकल मीडिया द्वारा प्रस्तुत की जा रही सामग्री में इन दोनों तत्वों का अभाव दिखता है.

 

ऊपर के दो उदाहरणों को छोड भी दें टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के नाम से लगातार प्रसारित होने खबरों में हम जनसरोकार का अभाव देख सकते हैं. इन खबरों का प्रभाव बहुत थोडे से लोगों पर हो सकता है लेकिन पूरे देश या समाज का हित इससे सिद्ध नहीं हो सकता. सितारों से जुडी खबरें किसी फिल्मी बुलेटीन या फिल्म आधारित चैनल के लिए ब्रेकिंग हो सकती हैं , हर खबरिया चैनल के लिए नहीं. उन सितारों के प्रसंशकों को भी यह ब्रेकिंग लग सकती है लेकिन इस वजह से इसे पूरे देश पर नहीं थोपा जा सकता.

 

चैनलों की ओर से यह भी दलील दी जाती है कि सेलिब्रटी से जुडी खबरों मे जनता की रुचि रहती है. गौर करने की बात है कि ऐसी रुचि रखने वालों की संख्या कितनी है. जनरुचि को मापने के लिए जिस टीआरपी ओ आधार बनाया जाता है उसका सिस्टम सिर्फ चार हजार हाई प्रोफाईल घरों तक सीमित रहता है. क्या इन महज चार हजार लोगों की पसंद को करोडों की पसंद मान लेना जायज है ? क्या इन हाई प्रोफाईल लोगों की पसंद और मध्यवर्ग की पसंद एक ही है? या फिर इन चैनलों का दर्शक वर्ग सिर्फ वह कथित एलिट वर्ग ही है? तीनों सवालों का एक ही जवाब होना चाहिए -नहीं. तो फिर किस जनरुचि की बात चैनल करते हैं.

 

अगर बडी संख्या मे लोगों की रुचि हो भी तो एक और सवाल उठता है कि क्या जनरुचि को जिम्मेवारी पर हावी हो जाने देना चाहिए ? मीडिया की तीनों जिम्मेदारियों सूचना , ज्ञान और मनोरंजन में से सूचना को केन्द्रित कर के समाचार चैनलों कि शुरुआत हुई. फिर समाचारों के बीच रुचि या मनोरंजन को जरुरत से ज्यादा जगह क्यों दी जा रही है ? ऐसे विषय मनोरंजन आधारित चैनलों के लिए छोड दिया जाना चाहिए. ऐसा लग रहा है कि समाचार चैनल कहीं ना कहीं मनोरंजन वालों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने पर उतारु हैं.

ब्रेकिंग न्यूज में बद्लाव सिर्फ सेलिब्रेटी शख्सियतों की ओर मुडा है ऐसी बात नहीं है. कई बार छोटी छोटी चीजें जैसे छोटी-मोटी सडक दुर्घटना , किसी शहर मे एक-दो मकान का गिरना, सुदूर इलाकों में हत्या-बलात्कार की घटना आदि ब्रेकिंग न्यूज बना दी जाती है. यह चिंता कहीं नहीं की जाती कि ब्रेकिंग न्यूज के रूप में महिमामंडित किये जा रहे उस समाचार का क्या जनसरोकार है और कितने बडे जनसमुदाय पर उसका क्या असर पडने वाला है.

सेलिब्रेटीज के मामले में स्पष्टतः बाजार का हित उनसे जुडा हुआ है. इसलिए उनसे सम्बंधित खबरों को अधिक कवरेज के लिए बाजार का दबाव सम्भव है लेकिन अन्य मामलों में यह कारक भी नहीं है. फिर मीडिया समूह इन हल्की खबरों के पीछे क्यों भाग रहे हैं ? ऐसा लगता है कि मीडिया समूह दर्शकों के दरवाजे तक पहुंचना चाहते हैं. इस भागमभाग में सामुदायिक नेतृत्व की जिम्मेदारी छूटने की उसे कोई परवाह नहीं है. जिम्मेदारी का अहसास न होना दिशाहीनता का बडा कारण है.

 

Coverage of SAARC SUMMIT ON TV NEWS April 11, 2007

Filed under: Analysis — cmsmedialab @ 6:12 am

 SAARC Summit versus Top issues on Indian TV News Channels

Channel

3rd April 2007

4th April 2007

SAARC Summit (Time Devoted)

Top issues of the day

(Time Devoted)

SAARC Summit

(Time Devoted)

Top issues of the day

(Time Devoted)

Aaj Tak

0 m

Cricket+ Bollywood+ Comedy = 111 m

0 m

Cricket+ Comedy = 167 m 

NDTV India

1.5 m

Cricket+ Election = 96 m

1 m

Cricket = 131 m

Star News

    0.75 m

Bollywood+ Home Loan+ Comedy = 74 m

0 m

Cricket+ Bollywood+ Comedy = 103 m

Zee News

     1 m

Cricket+ Election+ Bollywood = 68 m

  0.5 m

Cricket+ Yoga & Sex = 117 m

 Figures are of Prime Time (7-11pm) coverage by different news channels

 Time in Minutes

Source: CMS Media Lab

 

टीवी की 5 बडी खबरें April 4, 2007

Filed under: Top Stories on TV News — cmsmedialab @ 11:58 am

                    हफ्ते का हिसाब

                                    26मार्च- 1 अप्रैल , 2007

  

स्थान

 Rank

बडी खबर Top Story समय (मिनट में  ) Time( in minute)  *समय(%) Time (%)
 1     क्रिकेट   714 24
 2 हास्य कार्यक्रम 239  8
 3 उत्तर प्रदेश चुनाव 161 5
 4 बॉब वूल्मर 115  4
 5 अभिषेक-ऐश्वर्या 112  4

चार राष्ट्रीय हिन्दी खबरिया चैनलों (आज तक,स्टार न्यूज, एनडीटीवी इंडिया और जी न्यूज  ) द्वारा प्राइम टाइम (7-11pm) में दिया गया समय

 

प्रतिशत हफ्ते भर में चार चैनलों के कुल खबर समय का है


स्रोत:  सीएमएस मीडिया लैब 

  # Time Devoted During Prime Time (7-11 pm) by 4 National News Channels (Aaj Tak, NDTV India,   Star News and Zee News)  

   # Time in minutes

  Source: CMS Media Lab  

 

टीवी की सात बडी खबरें March 29, 2007

Filed under: Top Stories on TV News,Uncategorized — cmsmedialab @ 5:28 am

                                              19- 25मार्च, 2007

  

स्थान

 Rank

बडी खबर

 

Top Story

समय (मिनट में  )

 Time( in minute) 

*समय(%) Time (%)

 1

   विश्व कप क्रिकेट

843

 23

 2

   बॉब वूल्मर की हत्या

 627

17

 3

    निठारी कांड

 103

 3

 4

 शकीरा की सुरों पर थिरकी मुंबई 

 95

 3

 5

  राहुल के बाबरी मस्जिद बयान पर बवाल

 66

 2

 6

प्रमोद महाजन हत्या मामला

35

 1

 7

एनसीपी ने शिव सेना को ठुकराया

29

 1

 चार राष्ट्रीय हिन्दी खबरिया चैनलों (आज तक,स्टार न्यूज, एनडीटीवी इंडिया और जी न्यूज  ) द्वारा प्राइम टाइम (7-11pm) में दिया गया समय

प्रतिशत हफ्ते भर में चार चैनलों के कुल खबर समय का है

# समय (मिनट में)


स्रोत:  सीएमएस मीडिया लैब 

  # Time Devoted During Prime Time (7-11 pm) by 4 National News Channels (Aaj Tak, NDTV India,   Star News and Zee News)  

   # Time in minutes

  Source: CMS Media Lab   
       

                
 

 

 
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