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चार सौ मौतें भी खबर नहीं ! October 24, 2007

Filed under: Discussion — cmsmedialab @ 11:15 am

 रियलिटि शो में प्रतियोगियों की कशमकश या ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट का खुमार अब तक शायद आपके ज़ेहन से उतरा नहीं होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं आपके ही देश के एक हिस्से में सिर्फ इसी वर्ष लगभग चार सौ लोग एक ही बीमारी के कारण मौत के मुंह में समा चुके हैं. आपकी जानकारी से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि क्रिकेट के मैदान और रियलिटी शो के स्टूडियो से पल पल कि जानकारी लाने वाली मीडिया साल भर से जारी इस घटना को क्यों नहीं दिखा पायी.

यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि देश में हुई इतनी बडी घटना यहां के संचार माध्यमों के नज़र में नहीं आती है जबकि एक विदेशी समाचार संस्थान इसे प्रमुखता से प्रसारित करता है.

इस हालत ने एक और सवाल खडा कर दिया है कि क्या लगातार गलाकाट प्रतियोगिता बढने के बावजूद भारतीय मीडिया की गुणवत्ता स्तरीय नही हो पायी है. आज भारत में लगभग 50 समाचार चैनल खबरों का प्रसारण कर रहे हैं , बडी संख्या में चैनल लाइन में भी हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इनकी बढती संख्या से समाचारों का दायरा बढा है ? जबाव नकारात्मक ही प्रतीत होता है.

आज सभी माध्यमों की पुरजोर कोशिश अधिक से अधिक दर्शक या श्रोता तक पहुंचने की है. लेकिन क्या उस दर्शक या श्रोता वर्ग की जरूरतों को ये चैनल ध्यान में रख रहे हैं ? किसी खास वर्ग का टेस्ट इन जरूरतों पर हावी तो नहीं हो रहा ? आम आदमी की जरूरतों के प्रति मीडिया का रवैया आजकल सवालों के घेरे में है ..

देश के सबसे बडे राज्य में एक ही बीमारी से मरने वालों का आंकडा चार सौ पार कर जाता है मगर राष्ट्रीय चैनलों पर इसकी भनक तक नहीं सुनाई देती है. इसी स्थिति से नागरिक मुद्दों के प्रति समाचार चैनलों की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

मामला पूर्वी उत्तर प्रदेश का है. इसके दस जिलों में दिमागी बुखार नामक बीमारी ने भयानक रूप धारण किया हुआ है. इस बीमारी से सिर्फ इस साल लगभग चार सौ जानें जा चुकी हैं. बिडंबना है कि किसी भी राष्ट्रीय चैनल ने इस खबर को कवर करने की कोशिश नहीं की. यहां तक कि जनता के पैसे से चलने वाले चैनल दूरदर्शन पर भी यह खबर नहीं दिखायी गयी. गौरतलब है कि वर्ष 2005 में भी इसी बीमारी से लगभग 1600 लोगों की जान चली गयी थी.

यह खबर 22 अक्टूबर को बीबीसी रेडियो की हिन्दी सेवा ने प्रसारित की. इसने एक घंटे के कार्यक्रम आजकल में लगभग 3 मिनट का न्यूजटाइम इस खबर पर खर्च किया. ध्यान देने की बात है जिस समय यह खबर प्रसारित हुई उसी समय प्रभावित क्षेत्र भारतीय समाचार चैनलों पर चर्चा का विषय जरूर था मगर किसी अन्य कारण से. योगी आदित्यनाथ के जूलुस में फायरिंग इस समय टीवी न्यूज चैनलों की हॉट स्टोरी थी. यह खबर भी गोरखपुर की थी. बीमारी से प्रभावित 10 जिले इसी के आस पास हैं.

भौगोलिक सीमा से बाहर निकल कर देखें तो जिस खबर को इस दिन टीवी चैनलों पर सबसे ज्यादा महत्व मिला वह थी संजय दत्त का दुबारा जेल जाना. दूसरे शब्दों में कहें तो एक सितारे से जुडी खबर लोकहित पर भारी रही.

बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बिहार और नेपाल के लोग भी इस बीमारी की चपेट में आकर मर चुके हैं. इस प्रकार यह मामला सिर्फ राज्य या क्षेत्र विशेष की सीमा में न सिमट कर अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का हकदार है. इस हालत में राष्ट्रीय मीडिया में इस खबर को जगह न मिलना चिंताजनक है.

खबर में यह भी बताया गया कि प्रशासन ने बीमारी फैलानेवाले वायरस जापानी इनसेफ़लाइटिस पर काबू पाने का दावा किया है लेकिन अब किसी नये वायरस की वजह से बीमारी फैल रही है जिसका पता नहीं चल पा रहा है. ऐसे में प्रशासनिक विफलता का भी मामला बनता है.   बीमारी बाढ के प्रदूषित पानी के कारण फैली. इस प्रकार बुनियादी नागरिक सुविधाओं का भी प्रश्न उठता है.

प्रभावितों की बडी संख्या , बडा भौगोलिक क्षेत्र, नागरिक जीवन के विभिन्न दृष्टिकोण आदि सब कुछ होने के बावजूद इस खबर को मीडिया ने नजरअंदाज किया है. ऐसा भी नहीं है कि मीडिया की ओर से इन मुद्दों की उपेक्षा का यह पहला मामला हो. खास कर स्वास्थ्य विषय पर तो मीडिया का ध्यान बिल्कुल ही नहीं है. हाल ही में एक रिपोर्ट में सीएमएस मीडियालैब ने कहा था कि भारत के प्रमुख टीवी न्यूज चैनल समाचारों के लिए खर्च कुल समय का महज 0.7% स्वास्थ्य संबंधी खबरों पर खर्च करते हैं. देश के कई पिछडे इलाकों खासकर आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव लगातार मौतों का कारण बन रहा है लेकिन ये खबरें सब तक नहीं पहुंच पाती हैं.

जाहिर तौर पर इस भयानक बीमारी से मौतों का सिलसिला अभी रुका नहीं है लेकिन यह घटना एक बार फिर सवाल छोड गयी है कि क्या मीडिया कम महत्व की या कम लोगों को प्रभावित करनेवाली खबरों को जनहित के मुद्दों से ज्यादा तरजीह देता रहेगा ? चैनलों के व्यावसायिक हितों के कारण ऐसा होने की संभावना ज्यादा दिखती है. ऐसे में फिर एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि जनसामान्य की जरूरतों की तस्वीर कौन दिखायेगा और इन खबरों के लिए किससे उम्मीद करेंगे.