एक स्कूल…
जहां बाथरूम जाते ही…
लडकियां हो जाती है…
बेहोश…
क्या है बाथरूम का राज?
क्राइम रिपोर्टर.
देखते रहिए…
ये किसी सी ग्रेड फिल्म की पंक्तियां नहीं ,बल्कि एक लोकप्रिय चैनल के साप्ताहिक कार्यक्रम का प्रोमो है. आजकल टीवी न्यूज चैनलों पर अपराध समाचार के नाम पर इस तरह के संवादों को पेश करने का दौर चल पडा है. एक अन्य चैनल पर अपराध समाचारों पर आधारित कार्यक्रम के प्रोमो में लगातार ‘एक हसीना‘ ‘ दो दीवाने‘ जैसे जुमलों का प्रयोग किया जाता रहा.
इन दो प्रोमो से स्पष्ट है कि टीवी चैनल समाचार दिखाने की बजाय उन्हें भुनाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं. इसके लिए खबर को ज्यादा से ज्यादा सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है. अपराध आधारित कई कार्यक्रमों के नाम भी उतने ही सनसनीखेज रखे गये हैं. कई बार तो एंकर इतने जोश में बोल रहे होते हैं मानो बहुत बडी सफलता मिली हो.
सवाल उठता है कि क्या इन कार्यक्रमों में प्रस्तुत संवाद में न्यूजसेंस भी है? अगर हां, तो क्या उस न्यूजसेंस के साथ न्याय किया जा रहा है?
क्यों दिखायी जाती है ऐसी खबरें:
मीडिया पर हावी बाजार के दबाव व अन्य तथ्यों पर गौर करें तो पता चलता है कि अपराध समाचारों पर आधारित इन कार्यक्रमों में आम तौर पर मानवीय रूचि का सबसे ज्यादा ध्यान रखा जाता है. इस कारण खबरों को नाटकीय व सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है.
सोचने की बात है कि क्या बाजार की होड व टीआरपी की दौड में संवादों को इतने घटिया स्तर तक जाने देना चाहिए ? साथ ही यह भी कि इन खबरों का कितना प्रभाव किन पर पडता है?
ध्यान से देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि अपराध की ये खबरें दूरगामी प्रभाव वाली नहीं होती है न ही बहुत बडे जनसमुदाय को प्रभावित करती है. एक छोटी सी आबादी तक ही इनका प्रभाव सीमित होता है.
कैसी हो प्रस्तुति:
सबसे पहले तो प्रस्तुत की जानेवाली सूचनाओं के न्यूजसेंस का ध्यान रखा जाना चाहिए. उचित न्यूजसेंस होने पर ही उनको खबर के रूप में दिखाना चाहिए. प्रस्तुति में आवश्यक तथ्यों को ही महत्व दिया जाना चाहिए. अनावश्यक नाटकीयता और सनसनी से बचना चाहिए.
क्या होगा असर :
कम महत्व के खबरों को इस तरह प्रस्तुत करने से महत्वपूर्ण मुद्दों पर जरूरी चर्चा नहीं हो पायेगी. उनके लिए जरूरत से कम समय और संसाधन उपलब्ध हो पाएंगे. एक सर्वेक्षण के अनुसार टेलीविजन भारत की लगभ्ग आधी आबादी के लिए सूचना का प्राथमिक स्रोत है. कम महत्व की खबरों को अनावश्यक रूप से चटपटा बनाकर पेश करने से टीवी महज मनोरंजन के साधन के रूप में सीमित रह जाएगा. साथ ही , गंभीर मुद्दों पर चर्चा बाधित होने से देश की सामाजिक आर्थिक प्रगति भी कहीं न कहीं प्रभावित होगी.