बदलाव समय की नियती है. समय के साथ साथ हर चीज बदलती है, इस लिहाज से मीडिया में बदलाव भी लाजिमी है. मगर स्थिति हास्यास्पद तब हो जाती है जब यह बदलाव दिशाहीन हो जाए. हाल के दिनों में यह दिशाह्वीन बद्लाव दिख रहा है टेलीविजन की दुनिया में सबसे ज्यादा प्रचलित शब्द ब्रेकिंग न्यूज के अर्थ में. जो तथ्य समाचार बनने के भी लायक नहीं उन्हें जिस तरह से ब्रेकिंग न्यूज कह कर प्रस्तुत किया जा रहा है उससे लगता है कि “समाचार” या “न्यूज” शब्द की परिभाषा ही बदल चुकी है.
पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे ट्रेंड को देखें तो लगता है कि “ब्रेकिंग न्यूज” का अस्तित्व ही खत्म हो गया है. ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर जो चीजें टेलीविजन चैनलों की ओर से परोसी जा रही हैं उनमें से अधिकांश फिल्मी सितारों , खिलाडियों या नेताओं की जिंदगी से सम्बद्ध होते हैं. उनसे सम्बद्ध कोई महत्वपूर्ण तथ्य नहीं बल्कि उनके दैनिक जीवन के क्रियाकलाप. या फिर किसी कि निजी जिन्दगी में बनते बिगडते रिश्ते ब्रेकिंग न्यूज की जगह लेते हैं. किन्ही दो लोगों का अफेयर , उनके बारे में उडी अफवाह आदि चीजें ही आज ब्रेकिंग न्यूज कह कर दिखलायी जा रही हैं.
स्थिति को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए हम बीते दिनों प्राईम टाईम में प्रसारित कुछ ब्रेकिंग न्यूज पर नजर डालते हैं.
२३.०८.०७ रात १०:३० बजे – स्टार न्यूज : ऐश्वर्या मां बनने वाली नहीं, अभीषेक का इनकार
२७.०८.०७ रात १०:१५ बजे – आज तक : जोधपुर जेल सुपरिंटेंडेंट का बयान, सलमान ने जेल में खाया खाना.
ब्रेकिंग न्यूज की शुरुआत के बारे में विश्लेषक कहते हैं कि यह कल्पना खबरिया चैनलों के आरंभिक दिनों में उभरी. उन दिनों यह व्यवस्था बनायी गयी कि अगर अचानक कोई बहुत बडी घटना हो जाती है या राष्ट्रीय-सामाजिक परिदृश्य में कुछ ऐसा होता है जिसका समाज देश या दुनिया पर व्यापक असर पडने वाला है तो पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों को ब्रेक कर (रोक कर) इन नयी जानकारियों का प्रसारण किया जाता था. आज हालात यह है कि नाग-नागिन के प्रेमालाप से लेकर बंदर भालू के करतब या जेल में बंद एक सेलीब्रेटी कैदी का खाना-सोना ब्रेकिंग न्यूज कहा जा रहा है.
सवाल उठता है कि ब्रेकिंग न्यूज क्या हो? किन खबरों को ब्रेक किया जाए? विशेषज्ञों के अनुसार मीडिया का पहला काम जनमानस तक उपयोगी जानकारी पहुंचाना है. जानकारियों में प्रभावोत्पादकता भी हो और व्यापक जनहित भी जुडा हो. पर आजकल मीडिया द्वारा प्रस्तुत की जा रही सामग्री में इन दोनों तत्वों का अभाव दिखता है.
ऊपर के दो उदाहरणों को छोड भी दें टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के नाम से लगातार प्रसारित होने खबरों में हम जनसरोकार का अभाव देख सकते हैं. इन खबरों का प्रभाव बहुत थोडे से लोगों पर हो सकता है लेकिन पूरे देश या समाज का हित इससे सिद्ध नहीं हो सकता. सितारों से जुडी खबरें किसी फिल्मी बुलेटीन या फिल्म आधारित चैनल के लिए ब्रेकिंग हो सकती हैं , हर खबरिया चैनल के लिए नहीं. उन सितारों के प्रसंशकों को भी यह ब्रेकिंग लग सकती है लेकिन इस वजह से इसे पूरे देश पर नहीं थोपा जा सकता.
चैनलों की ओर से यह भी दलील दी जाती है कि सेलिब्रटी से जुडी खबरों मे जनता की रुचि रहती है. गौर करने की बात है कि ऐसी रुचि रखने वालों की संख्या कितनी है. जनरुचि को मापने के लिए जिस टीआरपी ओ आधार बनाया जाता है उसका सिस्टम सिर्फ चार हजार हाई प्रोफाईल घरों तक सीमित रहता है. क्या इन महज चार हजार लोगों की पसंद को करोडों की पसंद मान लेना जायज है ? क्या इन हाई प्रोफाईल लोगों की पसंद और मध्यवर्ग की पसंद एक ही है? या फिर इन चैनलों का दर्शक वर्ग सिर्फ वह कथित एलिट वर्ग ही है? तीनों सवालों का एक ही जवाब होना चाहिए -नहीं. तो फिर किस जनरुचि की बात चैनल करते हैं.
अगर बडी संख्या मे लोगों की रुचि हो भी तो एक और सवाल उठता है कि क्या जनरुचि को जिम्मेवारी पर हावी हो जाने देना चाहिए ? मीडिया की तीनों जिम्मेदारियों सूचना , ज्ञान और मनोरंजन में से सूचना को केन्द्रित कर के समाचार चैनलों कि शुरुआत हुई. फिर समाचारों के बीच रुचि या मनोरंजन को जरुरत से ज्यादा जगह क्यों दी जा रही है ? ऐसे विषय मनोरंजन आधारित चैनलों के लिए छोड दिया जाना चाहिए. ऐसा लग रहा है कि समाचार चैनल कहीं ना कहीं मनोरंजन वालों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने पर उतारु हैं.
ब्रेकिंग न्यूज में बद्लाव सिर्फ सेलिब्रेटी शख्सियतों की ओर मुडा है ऐसी बात नहीं है. कई बार छोटी छोटी चीजें जैसे छोटी-मोटी सडक दुर्घटना , किसी शहर मे एक-दो मकान का गिरना, सुदूर इलाकों में हत्या-बलात्कार की घटना आदि ब्रेकिंग न्यूज बना दी जाती है. यह चिंता कहीं नहीं की जाती कि ब्रेकिंग न्यूज के रूप में महिमामंडित किये जा रहे उस समाचार का क्या जनसरोकार है और कितने बडे जनसमुदाय पर उसका क्या असर पडने वाला है.
सेलिब्रेटीज के मामले में स्पष्टतः बाजार का हित उनसे जुडा हुआ है. इसलिए उनसे सम्बंधित खबरों को अधिक कवरेज के लिए बाजार का दबाव सम्भव है लेकिन अन्य मामलों में यह कारक भी नहीं है. फिर मीडिया समूह इन हल्की खबरों के पीछे क्यों भाग रहे हैं ? ऐसा लगता है कि मीडिया समूह दर्शकों के दरवाजे तक पहुंचना चाहते हैं. इस भागमभाग में सामुदायिक नेतृत्व की जिम्मेदारी छूटने की उसे कोई परवाह नहीं है. जिम्मेदारी का अहसास न होना दिशाहीनता का बडा कारण है.