टीवी पर वही दिखता है जो आप देखना चाहते है.बेसिर-पैर की खबरें दिखाने के पीछे तो टीवी यही तर्क देता है.पर खबर आप तय नहीं करते. वो तो टीवी वाले ही तय करते हैं.टैम की हर हफ्ते आने वाली टीआरपी के आधार पर.जिससे पता चलता है कि दर्शकों ने कैसी खबरों को ज्यादा देखा.पर इस टीआरपी से दर्शकों के असली मिजाज का पता नहीं चलता. लेकिन बाजार टैम के टीआरपी के आधार पर ही विज्ञापन देता है. और टीवी विज्ञापन पर ही टिका है.यानी टीआरपी पर.तो सबकुछ टीआरपी है.और ये टीआरपी का ट्रेंड और टेरर ही खबर की किस्मत लिखता है.भले उस पर आम दर्शकों की चाहत की मजबूरियों का लेबल लगा हो. जो असल में बाजार का लेबल है.पर बेचने के लिए चाहत का लेबल लगाना जरूरी है.और बचने के लिए आरोप लगाना जरूरी. कि हम नहीं तुम चंडूखाने की खबर दिखाते हो.पर इस हमाम में सब नंगे है.फिर भी झगडा है. नंगई का. भ्रम का.पर भ्रम की चाहत जरूरत पर हावी है.तभी तो असली मुद्दे नकली से दबते है.जैसे बच्चे के लिए चाकलेट की नहीं दुध की दरकार है.ये माँ जानती है.समझती है.इसलिए डाट डपटकर चाकलेट नहीं,दुध देती है बच्चे को.बनिया भी ये बात समझता है.पर जानता है जनता को चाकलेट देकर फुसलाना आसान है.बहकाना आसान है.ये गंदा है पर बाजार में बचे रहने की मजबूरी भी है.पर मजबूरी के नाम दिन भर कुंजीलाल के मौत का लाइव ड्रामा दिखाना कितना सही है.भले ही इसे सही ठहराने के लिये टीवी बाजार में बचे रहने की जरूरत और कुंजीलाल के दावों की पोल खोलने जैसे कुतर्क गढे. और ऐसी ऊलजलूल खबर गढते रहे.पर यही करते करते टीवी भटक गया है.और इस भटकाव में बहकने लगा है.तभी तो मीका जैसा सीरियल किसर टीवी पर छाया रहता है.और राखी सामाज के सारे शर्म के बंधन तोडकर बेशर्मी से रंगीन औरत की लडाई कम कपडो में टीवी पर महीनों लडती है.पर टीवी आम औरत की लडाई नहीं लडता है.टीवी पर रंगहीन औरत की कहानी कम ही दिखती है.रंगीन राखी के रंग ज्यादा दिखते है.रंगीन खबरों में जान होती है.तभी तो मटुक की जान बनी जुली प्रेम की आग में टीवी पर महीनों जलती है. टीवी ऐसी आग को जलाता है ताकि टीवी चलता रहे. पर आम आदमी कम ही चलता है टीवी पर. अमिताभ जैसा खास पैदल चले तो टीवी पर लाइव चलता है.घर से मंदिर तक.आधी रात में.बीमार पडे तो बेड के रंग से खाने के लिस्ट तक.सब चलता है.पर आम आदमी तभी खबर बनता है जब गरीबी की आग में लाइव जलता है. लेकिन अचानक कोई लाइव नहीं जलता.टीवी जलाता है.षडयंत्र करके.और मौत का सामान भी देता है.ताकि खबर बने और खबर की नई सभ्यता.यही टीवी के खबर की तहजीब है.
बहुत बढ़िया विश्लेषण किया है टीआरपी का मीडिया लैब ने।
सच में हमें इस ओर सोचने के लिए नई दिशा दी है।
बहुत-२ धन्यवाद।
टीवी देखना अब शुद्ध रूप से समय की बर्बादी है।
आम आदमी तभी खबर बनता है जब गरीबी की आग में लाइव जलता है. लेकिन अचानक कोई लाइव नहीं जलता.टीवी जलाता है.षडयंत्र करके.और मौत का सामान भी देता है.ताकि खबर बने और खबर की नई सभ्यता.यही टीवी के खबर की तहजीब है.
सही लिखा!