आप टीवी पर क्या देखते है.खबर या खबर का तमाशा.आजकल तामाशा ही खबर है. सो खबर तमाशा है या तमाशा खबर है ये तय करने की जरूरत ही नहीं रही.ये भी तय करने जरूरत नहीं कि हम तमाशबीन हैं. लेकिन इस तमाशे में टूटती है, गिरती है, मरती हैं खबरें. मरते नही है हम तमाशबीन .गिरते हैं हम.गिरती है गिरने की सीमायें, हमारी और तमाशे की.प्रिंस जब गड्ढे में गिरता है तो हम भी गिरते हैं.टीवी हमें गिराता है.बेवकूफी के गड्ढे में.हम रोते हैं.रातभर जागते हैं दुआ करते है. भूखे रहते हैं.प्रिंस के लिए.तमाशे के लिए.अपनी बेवकूफी के लिए. अब तक लाखों किसान मरे.कई लोग हर दिन भूख से मरते हैं.हम नहीं जागते.टीवी हमें नहीं जगाता.एक अनजान सी माडल नफीसा की मौत जगाती है. टीवी को .टीवी उलझाता है. खबर गढता है. प्रश्न करता है- मौत है या आत्महत्या. डाक्टर , मनोवैज्ञानिक और दोस्त बुलाये जाते है. उलझी खबर सुलझता है. पुराना तमाशा खत्म होता है नया शुरू. खत्म नहीं होते हैं- तमाशबीन और हमारी बेवकूफी. कभी किसी की इज़्ज़त का तमाशा .तो कभी खबर के नाम पर लोगों की भावनाओं का बलात्कार. जहां लाखों लोगों को तन ढकने के लिए कपडे नसीब नहीं होते,वहां किसी गोरी की चोली सरकना या फटना इतनी बडी राष्ट्रीय समस्या बन जाती है कि चैनल उसके कमसिन काया पर मचल उठता है और प्रमुखता से उसके अंग को बार-बार बेशर्मी से दिखाता है. ये कौन सी पत्रकारिता है.क्या पत्रिकारिता इतनी पतित हो गयी है कि देह की दलाली पर उतर आये. अगर नही ,तो क्यों जनहित के नाम पर हम किसी नेता के शारीरिक भूख मिटाने के टीवी पर सरेआम गवाह बनते है.इसमे किसका हित है. उस लडकी का,जिसने जाने-अनजाने, जनहित के लिए सरेआम अपना शरीर बेचा या उस चैनल का, जिसने उस लडकी के शरीर को पहले उस नेता को बेचा और फिर दर्शकों को.और इस तमाशे मे कौन नहीं बिका .नेता बिका .लडकी बिकी .चैनल बिका. और बिक गए हम. बिक गई हमारी हया.और बिकी खबर. ये बेचते ही तो हैं. शर्म बेचते हैं. नैतिकता बेचते हैं. फिर किसी का देह बेचकर.उसकी खबर बेचते हैं. विज्ञापन को खबर बनाकर बेचते है.किसी की निजी जिंदगी के तनाव को बेचते हैं.उनके अनतरंग मनोभाव को बेचते है.जिंदगी के सुसाइड की लाइव मौत बेचते हैं. ऐसी खबरों से किसका फायदा है. किसका सरोकार है. किसका हित है.ये अगर चैनलहित नहीं तो क्या जनहित है! लेकिन इस बेचने के चक्कर मे खबर नही बचती है.घुट-घुट कर मरती है. और हम तमाशबीन की तरह् खबरों का तमाशा देखते हैं.खबर की मौत को नहीं !