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जिरह खबर की.. December 24, 2006

Filed under: Discussion — cmsmedialab @ 12:19 pm

आइए एक ज़िरह को शुरू करते है। ज़िरह सही की। ज़िरह वास्तविकता की। ज़िरह मौजूं की। और बहस खबर की। खबर आप और आपकी जानकारी का पहला स्रोत। जिस दुनिया में हम रह, सो और जाग रहे है, वो बदलती दुनिया है। समय के साथ खबर बदली है और उसका चेहरा भी। चेहरों पर पत्रकारिता का युग शायद आ चुका है। आपका चेहरा, आपकी खबर, आपका नजरिया आपका असर। अमिताभ बच्चन से अनंत गुप्ता तक। प्रिंस से जेसिका तक। एक आंदोलन सा उठ खड़ा हुआ है। हर दिन टीवी ने आपको जगाया और जानकार बनाया है। सुलाया और रूलाया है। बहकाया और बतलाया है। ये बदलाव हलचल जैसा है। यकायक आप लाइव हो चले है। टीवी के दायरे घर के बेडरूम से सेंसेक्स की छत तक जा पहुंचे है। पर कुछ छूट रहा है। क्या। तलाश करने पर पता चलता है कि जिस टीवी को इस देश में केवल अड़तालीस साल हुए है। उसने अचानक ही अपनी तस्वीर बदलने की ठान ली है। निजीपन के दौर में निजी टीवी ने निजता पर ही हमला बोला है। जाहिर है हर शुरूआत में लड़खड़ाहट होती है। टीवी में भी है। पर जिसे वो बुन रहा है वो अक्स धीरे धीरे आम आदमी के पास दिखता नजर आ रहा है। ध्यान में रखना होगा कि देश में दस करोड़ के करीब टीवी सेट है जिनमें से साढ़े छह करोड में निजी टीवी ने दखल बनाई हुई है। निजी टीवी भले ही पन्द्रह साल पुराना हो, पर इसकी पहुंच तन से ज्यादा मन पर है ।  देश में टीवी पर विज्ञापन का बाजार  छह हजार करोड़ के आसपास है। और टीवी खबर इसका दस से बारह फीसदी। यानी खबर की कीमत बाजार में कम है। तो शायद यहीं वजह है कि खबर को मनोरंजन बनाया जा रहा है। इसकी शुरूआत किसने की, इसका जवाब मिलना मुश्किल है। पर आम आदमी की दशा दिशा दिखाता टीवी, खबर को मनोरंजन बनाने के लिए आम आदमी की चाहत को ही जिम्मेदार ठहरता है खुद को नहीं। अब बदलते दौर का नतीजा है या कहें कि आने वाले वक्त का तकाजा कि खबर देखने का नजरिया और नुस्खा दोनों ही बदल गए हैं। नजरिया इतना बदला है कि समाचार कोई भी पढ़े,  कैसा भी गढे, फर्क ज्यादा नहीं पड़ता। औऱ नुस्खा ये कि कार्यक्रम में कुछ भी दिखाया जा रहा हो,  देखना अच्छा लगता है। तो बदलता कौन है। कैसे। ये सवाल उठाने वाला कोई नहीं बचा है। बची है तो खबर, अपने सारे बदलावों के साथ। बीते समय में समय ही नहीं है आम आदमी के पास। जिसके पास पैसा है वो बारह घण्टे काम करता है, ज्यादा के लिए, जिसके पास नहीं है, वो भी जीने के लिए। इस सबके बीच उसे खबरें वो ही भाती है, जो उसे लाभ पहुंचा सके। चाय की दुकान पर बैठकर पेपर पढ़ने वाले अब टीवी लगाकर पिक्चर देखना पसंद करते है। खबर चौबीस घण्टे के फार्मेट में जी रही है। देखने वाले देख रहे है। प्रचार पाने वाले बेच रहे है। सूचना जुटाने वाले परोस रहे है। और इस बीच  खबर कहीं सिकुड़ रही है। खबर मर रही है। खबर बाहर आने को जगह बना रही है। उम्मीद है वो खबर अब तो आएगी। ज़िरह जारी है। आप भी शामिल है। बस खबर के साथ।    

 

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